Monday, September 6, 2010

मुंडन संस्कार :दिल्ली से हरिद्वार


मेरा मुंडन संस्कार कराने के लिए पापा , मम्मी और मै दो सितम्बर २०१० को दिल्ली से हरिद्वार के लिए सुबह नों बजे दिल्ली से हरिद्वार के लिए रवाना हुवे .जन्माष्टमी की वजह से उस दिन छुट्टी थी सो रोड पर ट्राफिक कम था ,हमने फ़टाफ़ट वजीराबाद पुल से यमुना पार किया, फिर गाजिआबाद आया . हिंडन नदी को पार कर हमारी गाड़ी NH-58 पर आ गयी . मुराद नगर , मोदी नगर होते हुवे हम फ़टाफ़ट मेरठ बाईपास पहुच गए . थोड़ा और आगे बढते ही मम्मी ने चाय पीने की इच्छा जताई . फिर पापा ने नत्थू स्वीट पर गाड़ी रोकी , केवल चाय पीना अच्छा नहीं लगता सो पापा ने चाय के साथ छोले भठूरे भी मंगा लिए . हमने छोले भटूरे खाए और चाय पी . वही एक और मजेदार वाकया घटा .


NH-58 का नजारा


NH-58 का नजारा

नत्थू स्वीट्स , मेरठ ,NH-58

फिर गाड़ी आगे बड़ी , आगे सड़क चौड़ी थी शायद एक्सप्रेस वे बन रहा है , टोल प्लाजा भी तैयार था , पर अभी शुरू नहीं हुआ था सो पैसे नहीं लगे पर अगले पांच छह महीने में शायद टोल लगना शुरू हो जायेंगा . मेरठ की सीमा से निकलते ही रोड के किनारे हरे भरे खेत नजर आने लगे . बाजरे के खेत , गन्ने के खेत और सुन्दर चौड़ा एक्सप्रेस वे , गाड़ी 100 KMPH की रफ़्तार से भागते हुवे मुज्जफरनगर को छोड़ते हुवे , उत्तारांचल में प्रवेश कर गई. रूरकी होते हुवे हम देव भूमि हरिद्वार पहुच गए. हरिद्वार में शांतिकुंज हमारी मंजिल थी , अगले दिन ( ०३/०९/२०१०) को मेरा मुंडन संस्कार और विद्यारंभ संस्कार होना था. शांति कुञ्ज हरिद्वार - ऋषीकेश हाई वे पर स्थित है. हिमालय की तलहटी पर बसा शांति कुञ्ज बहुत प्यारी जगह है. इसी दिन शाम में हम फ्रेस होकर हरिद्वार शहर घूमने निकले . हर की पौड़ी का बिहंगम नजारा हमारा इन्तेजार कर रहा था . गंगा नदी पुरे आवेग से बह रही थी ,आसमान में काले काले बादल छाए हुवे थे, सायं सात बजे गंगा आरती शुरू हुई, मंदिर के घंटे बजने लगे , अद्भुत नजारा था , अभिभूत कर देने वाला . गंगा आरती देख हमने चोटी वाला नामक रेस्तरा में खाना खाया और वापस शांति कुञ्ज लौट आये . अगली सुबह (०३/०९/२०१०) को मेरा मुंडन संस्कार और विद्यारंभ संस्कार वैदिक मंत्रोचार के बीच संपन्न हुआ , जिसका विवरण मै अगली पोस्ट में दूंगा .


शांति कुञ्ज , हरिद्वार में पापा के साथ



शांति कुञ्ज , हरिद्वार
हर की पौड़ी
हर की पौड़ी

हर की पौड़ी

हर की पौड़ी
हर की पौड़ी

10 comments:

शिक्षामित्र said...

संस्कारों की नींव बचपन में ही पड़ जाना अच्छा।

नीलम शर्मा अंशु said...

पुन: बधाई।

पर वो वाला फोटो कब दिखाओगे शोना ?

शुभम जैन said...

aree wah bahut sundar tashvire...

mundan ki foto ka intjar hai..

रावेंद्रकुमार रवि said...

मैं तो सोच रहा था कि वहीवाला फ़ोटो देखने को मिलेगा!

कुमार राधारमण said...

मुंडन संस्कार बपन में न हुआ तो बाद में झिझक होती है और औचित्य पर भी सवाल खड़े किए जाते हैं।

Babli said...

बहुत सुन्दर और प्यारी तस्वीरें है! अब तो माधव तुम्हारे मुंडन वाले तस्वीर का इंतज़ार रहेगा!

कविता रावत said...

BEHAT SUNDAR TASVEEREN... SACH MEIN HARIDWAR BAHUT ACHHA LAGTA HAI.. DO BAAR GAYEE HUN LEKIN AISA LAGTA HAI BAAR JAON... BAHUT ACHHA LAGA CHALO ESI BAHANE HAMNE BHI SAIR KAR LEE.

रावेंद्रकुमार रवि said...

इस पोस्ट की चर्चा यहाँ है -
कान्हा मेरे मन का मीत : सरस चर्चा (12)

नीरज जाट जी said...

ओहो, तो महाराज हमारे घर से मात्र पांच किलोमीटर दूर से निकल गये। यार तुमने नत्थू स्वीट का फोटू नहीं दिखाया, नहीं तो मैं बता देता कि यह है कहां।

यशवन्त माथुर said...

Bot atta laga tumale blog pal aake.
tum bot pyale lag laye ho apni saari fotos me.
Khoob aage badho aur naam kamao.

 
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