कल छत पर ऋतू दीदी के साथ खेल रहा था . दौड़ते दौड़ते गिर पडा , फर्स पक्के का था सो नाक पर चोट लग गयी . तेज दर्द हुआ , रोने लगा ,पापा दौड़े हुवे छत पर आये ,मुझे चुप कराया . अगले दिन घाव का निशाँ मेरे नाक पर बन गया .
चोट का निशान नाक पर

चोट का निशान नाक पर















6 comments:
संभल के खेला करो बच्चे !
अरे बेटू, ख्याल रखो...
koi nhi yar.chiti mar gayi.apna dhyan rekho
माधव ,
परसों तुम्हे चोट लग गयी ,अब ठीक होगी.आगे से ध्यान से खेलना अपना ख्याल रखते हुए.
भाई, चोट लगना भी जरूरी है। जब बडे हो जाओगे तो शरीर पर कोई निशान पूछा जायेगा, तब ये चोटें बडी काम आती हैं। मेरी भी बचपन में ठोडी ठुक गयी थी- बढिया तरह से। आज पहचान के तौर पर सबसे पहले ठोडी ही दिखाता हूं।
खेल में सावधानी बहुत जरूरी है!!
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आपकी पोस्ट की चर्चा तो बाल चर्चा मंच पर भी लगाई है!
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/11/29.html
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