Wednesday, April 7, 2010

कुर्सी


आरा और बक्सर में मेरे लिए कुर्सी खरीदी गयी थी , मै अपनी कुर्सी पर ही बैठता था , बहुत प्यार से संभाल कर रखता था मै अपनी कुर्सी . शान के साथ बैठता था उस पर . पर आरा से जब दिल्ली आया तो कुर्सी आरा में ही छुट गयी. यहाँ दिल्ली में कुर्सी थी नहीं . मम्मी ने पापा से मेरे लिए कुर्सी खरीदने को कहा , पापा ने सहमती तो दे दी पर कुर्सी नहीं आई . मम्मी रोज पापा को कुर्सी के बारे में कहती और पापा रोज मीठी गोली दे देते.

फिर एक दिन मामा मुझे लेकर फर्नीचर की दूकान पर गए और मेरे लिए कुर्सी खरीदी , मै बहुत खुस हुआ , कुर्सी खुद ही लेकर घर आया , जब घर आया तो मेरे दोस्त नमन और तनु मेरी कुर्सी देखने आये , मेरी कुर्सी देखकर दोनों का मन ललचा , बैठने के लिए मेरी मिन्नतें करने लगे . पर मै अभी दिल का छोटा हूँ मैंने उन्हें बैठने नहीं दिया , मजबूरन उन्हें मेरी कुर्सी दूर से देखकर ही संतोष करना पडा , थोड़ी देर बाद तनु को कुर्सी पर बैठने दिया , पर बस एक पल के लिए फिर उतार दिया .फिर शाम को जब पापा घर आये , कुर्सी देखकर शर्मा गए.
मुझे अपनी कुर्सी से बहुत प्यार है , इस पर बैठकर बहुत आनंद आता है , बहुत खुस होता हूँ और इस के चलते दोस्तों में धाक भी जमती है , आप भी देखे मेरी जादुई कुर्सी है ना कमाल की !












1 comments:

Shekhar kumawat said...

aap ki kursi ka color acha he

शानदार
BADHAI IS KE LIYE AAP KO

SHAKHE KUMAWAT

http://kavyawani.blogspot.com/

 
Copyright © माधव. All rights reserved.
Blogger template created by Templates Block Designed by Santhosh
Distribution by New Blogger Templates