Friday, January 28, 2011

एट बेलो (Eight Below), एक होलीवुड मूवी जिसने माधव को रुला दिया !

कल रात मैंने Eight Below नाम की एक होलीवुड फिल्म देखी . माधव भी अपनी मम्मी के साथ ये मूवी देख रहा था . किसी सत्य घटना पर आधारित ,ये फिल्म आदमी और जानवर के बीच के भावनात्मक रिश्ते की कहानी है . फिल्म अंटार्कटिका के एक अन्वेषक (Explorer) की है जो वही विक्टोरिया नाम के कैम्प में अपने आठ स्लेज कुत्तों के साथ रहता है. कुत्तों के नाम है -माया , ट्रूमैन,स्नोर्टी,मैक्स , ओल्ड जैक , शैडो . फिल्म बिपरीत परिस्थितियों में इंसानी जज्बे की जीने की कहानी है .इस फिल्‍म की कहानी मन को छूनेवाली और कलाकारों का अभिनय शानदार है. फिल्म में हीरो खराब मौसम के चलते घायल होकर अंटार्कटिका से वापस लौट आता है पर उसके आठ कुत्ते वही छूट जाते है . नायक को घर पर अपने बेटो ( नायक फिल्म में कुत्तों को बेटा कह कर बुलाता है ) की इतनी याद आती है कि वह अकेले ही उन कुत्तों को वापस लाने के लिए निकल पड़ता है . उसका साथ उसके दोस्त देते है और आखिर में वो सभी अंटार्कटिका अपने कुत्तों के पास पहुच जाते है. फिल्म मानवता , संवेदना और भावुक लम्हों के साथ खत्म हो जाती है . फिल्म स्वामिभक्ति (Loyalty) और दोस्ती( Friendship) की एक मिशाल देती है .


फिल्म खत्म होती है , तब रात के बारह बज रहे होते है , मै कंप्यूटर बंद करता हूँ . कम्पूटर बंद होते ही माधव रोने लगता है . ये रुलाई सामान्य नहीं थी , माधव दिल से रो रहा था , शायद माधव फिल्म की कहानी समझ चुका था और भावुक होकर रो रहा था या फिल्म के कुत्ते माधव को पसंद आये थे ? मुझे ये चीज समझ नहीं आई , कि माधव फिल्म खत्म होने के बाद फुट -फुट कर रोने क्यों लगा ? तीन साल के बच्चे में इतनी भावनात्मक समझ हो सकती है क्या ? माधव इतना ज्यादा दुखी हो गया कि उसने कल रात मुझसे कहानी भी नहीं सूनी,बल्कि दूध भी नहीं पीया .

फिल्म का हैंग ओवर आज सुबह भी दिखा , जगते ही जनाब ने वही फिल्म देखने की इच्छा जताई और स्कुल जाने तक वही फिल्म देखता रहा .

फिल्म Eight Below से मुझे बाल मनोबिज्ञान का एक अलग ही पहलु देखने को मिला.




फिल्म के कुछ दृश्य जो दिल को छू गए



6 comments:

राज भाटिय़ा said...

अरे मैने कल की टिपण्णी मे इसी लिये लिखा था कि बच्चो को इस उमर मे ऎसी फ़िल्मो से दुर रखना चाहिये मेरे ब्च्चे के साथ भी यही हुआ था, जो माधब के साथ हुआ हे, फ़िर मैने डा० से सलाह की थी, लेकिन डा० ने सिर्फ़ फ़िल्म ना देखने की सलाह दी, बच्चा फ़िर भी उदास रहा, तो मैने बच्चे को गोद मे बिठा कर उसे समझाया कि बेटा यह तो फ़िल्म हे, ओर फ़िर उसे रिवर्स चला कर दिखाया लेकिन मुझे कई दिन लग गये थे बेटे को नार्मल लाने मे, अब आप भी माधब को प्यार से समझाये ओर एक बार खुब जी भर के रोने दे, आंईदा कान पकडे कि बच्चे को अभी पांच सात साल दुर रखे,
बच्चे को बहुत ज्यादा आघात लगता हे, ओर बच्चा हम से ज्यादा भवूक होता हे,

अनुष्का 'ईवा' said...

मूवी तो सच में अच्छी है ही ....यहाँ तो सभी लोग अपने पेट को अपना बेटा या बेटी ही कह कर बुलाते है बल्कि उसी तरह प्यार से नाजों से रखते भी है . "माधव बी अ स्ट्रोंग मेन" मैं जब कभी रोती हूँ ममा कहती है स्मार्ट किड्स नेवर क्राय और मैं तुरंत चुप हो जाती हूँ .अब तुम भी नहीं रोना :)

mrityunjay kumar rai said...

@ भाटिया जी

भाटिया जी आपकी सलाह अच्छी लगी . आगे से ध्यान रखूंगा

mrityunjay kumar rai said...

@ अनुष्का 'ईवा'
जानकारी के लिए धन्यवाद

रावेंद्रकुमार रवि said...

मौका मिलते ही हम भी देखेंगे!

Dr. shyam gupta said...

----क्यों बच्चों को अभी से इस उम्र में इन ब्लोग आदि में घसीटते हो....खेलने -कूदने दो...आप अपना ब्लोग लिखें बस...अन्ग्रेज़ी फ़िल्म दिखाना भी मूर्खता का कार्य है...बल्कि फ़िल्म दिखाना ही....उनका बचपन अपना नाम करने के लिये न छीनें....कुछ और लोग भी हैं जो इस व्यर्थ के कर्म में लगे हैं( उदा..पाखी..) उनकी नकल न करें....

 
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