खेलने का असली मजा समूह में ही है . बिल्कुल बेफिक्र , बिंदास अपनों के बीच में खेलना . चिल्ल्लाना , चीखना , मरना , बहती हवा सा , बिलकुल अल्हड . आरा में वर्षा दीदी , ऋतू दीदी , राघव भैयाँ और मुह्हल्ले के कुछ और हम उम्र के साथ खेलने में बहुत मजा आता था . . ओका बोका ,आइस - पाइस( चोरी -छुपना ) और बहुत से खेल जिनको ओलम्पिक में जगह मिलनी चाहिए , हम खेलते थे , हमारे खेल में कोई हारता नहीं था , न ही कोई प्रथम या द्वितीय आता , बल्कि हर कोई जीतता था . दिल्ली में मै ये सब बहुत मिस करता हूँ . यहाँ दिल्ली में व्यक्तिगत परिवार में ये कहाँ मुमकिन है !
कविता :- प्रयास करो तो ऐसा
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*कविता :- प्रयास करो तो ऐसा *
प्रयास करो, प्रयास करो....
जिन्दगी के लिए प्रयास करो,
कुछ करने के लिए प्रयास करो....
जिन्दगी में सुधर करने का, प्रयास करो,
कि...














2 comments:
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।
खूब खेले..शाबास!
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